Poem : एक आह
“`एक आह की ज़िंदगी भी आख़िर ज़िंदगी क्या होती है एक ज़ख़्म से उभरती है एक ज़ख़्म में फ़ना होती है।क्या कहें किस से कहें ये ज़ुबान गद्दार है दर्द की इंतहा तो बस आँखों से बयाँ होती है।गुम हो जाएँगे हम भी आख़िर दस्तूर-ए-खुदाई है अभी तो रूह मेरी हर दिन टुकड़ों टुकड़ों में … [Read more…]
