Poem : ज़िनà¥à¤¦à¤—ी में
कितने लगायें अब पैबनà¥à¤¦ ज़िनà¥à¤¦à¤—ी में हो चà¥à¤•े हैं सब रासà¥à¤¤à¥‡ अब बंद ज़िनà¥à¤¦à¤—ी में रिसते हैं अब तो ज़खà¥à¤® लहू से कà¤à¥€ अशà¥à¤•ों से अपने à¤à¥€ हà¥à¤† करते थे हौसले बà¥à¤²à¤‚द ज़िनà¥à¤¦à¤—ी में लमà¥à¤¹à¥‹à¤‚ को जाने मà¥à¤ से ये कैसी दà¥à¤¶à¥à¤®à¤¨à¥€ है मà¥à¤ को à¤à¥€ मिलते ख़à¥à¤¶à¥€ के चंद ज़िनà¥à¤¦à¤—ी में … [Read more…]
