Poem: ऊर्जा और परिभाषा

देखा है कभीसूरज कोउगते हुएऔर डूबते हुएक्या फर्क होता हैथोड़ा रौशनी काऔर बहुत कुछनिकलता है सुबह सुबहएक जोश के साथबहुत ऊर्जा लिए हुएसुबह का संचार करते हुएहर कण कण मेंएक स्वर्णिम चादरबिखेर तेता हैप्रकृति केहर आयाम मेंप्राण भर देता हैअंधेरों के भी अंधेरों मेंपर ध्यान से देखोउगते सूरज कीपरिधि कोकहाँ सीमा है उस कीज्ञात ही … [Read more…]

Poem: Tum kaun the

तुम कौन थेजो आये थे मेरी जीवन मेंएक झोंका हवा का बन केकई रूप मेंकई रंग मेंकभी एक मित्र बन केकभी एक दार्शनिक बन केवो सब कुछ बन केजो मेरे अधूरेपन कोभर देता थाकुछ सुन्दर पलों सेतुम कौन थेयाद है मुझे तुम्हारा चेहराजो चमकता था एक समानअंधेरे में हो या रोशनी मेंउस रोशनी में मैं … [Read more…]

Poem : ज़िंदगी के धागे

ज़िंदगी के धागेबहुत कमज़ोर हो चले हैंटूटते तो हैं पर जुड़ते नहींउलझ जाते हैं एक दूसरे सेकभी लगते हैं मिलते हुएकभी लगते हैं एक विरोधाभासखुद से ही खुद काकभी कोई सोच और कभी कोई औरमन का अंतर्द्वंद और वो भी अंतहीनकटुता के प्रतिबिंब कभीतो कभी लाचारी का प्रवाहकितना विशाल कितना अथाहएककीपन के गहरे घावअग्नि से … [Read more…]

Poem: धर्म के सौदागर

जाने क्या लिखा है किताबों में,जाने क्या ये सब बोलते हैं,बचपन को बंदूक की नोक पे,धर्म के तराज़ू में तोलते हैं।काटते हैं मासूमियत को,हैवानियत की तलवार से,ज़हर ये किस रंग का,इंसानियत में घोलते हैं।ना आँसू ही रुकते हैं,ना लहू ही रुकता है,धर्म की अंधी भगदड़ में,हम सब लाशों पे दौड़ते हैं।जाएँगे कौन सी ज़न्नत में,ये … [Read more…]

Poem : एक आह

“`एक आह की ज़िंदगी भी आख़िर ज़िंदगी क्या होती है एक ज़ख़्म से उभरती है एक ज़ख़्म में फ़ना होती है।क्या कहें किस से कहें ये ज़ुबान गद्दार है दर्द की इंतहा तो बस आँखों से बयाँ होती है।गुम हो जाएँगे हम भी आख़िर दस्तूर-ए-खुदाई है अभी तो रूह मेरी हर दिन टुकड़ों टुकड़ों में … [Read more…]

Poem : बुलबुला

बुलबुला हूँ कुछ ही क्षण मेंक्षत-विक्षत हो जाऊँगा,पर अपने जीवन की अल्पता सेमैं नहीं घबराऊँगा।—चाहे सतह पर ही हो मेरेसात रंगों की चमक,चाहे अंतर्मन में उपस्थितहो एकाकी शून्य तक,एक बच्चे की ख़ुशी बन के मैंस्वयं ही बिखर जाऊँगा।अपने जीवन की अल्पता सेमैं नहीं घबराऊँगा।—किसने समझी है यहाँ परनटखट समय की अठखेलियाँ,एक क्षण में प्राप्त सब … [Read more…]

Poem – इस पेड़ पे जो लटकी हैं, वो लाशें नहीं हैं

इस पेड़ पे जो लटकी हैं,वो लाशें नहीं हैंखुशबू थीं वो किसी घर कीइज़्ज़त थी किसी के दर कीखेलती थीं कभी शायदइसी पेड़ के तलेछुपती थीं कभी शायदइस पेड़ की ओट मेंऔर शायद कभी इस पेड़ पेचढ़ के खेल भी होगापर आज वो लटकी हैंएक बेज़ुबान बुत बन केपेड़ ही अच्छे हैंशायद इन इंसानों सेजीते … [Read more…]

Poem : पैबन्द ज़िन्दगी में

कितने लगायें अब पैबन्द ज़िन्दगी मेंहो चुके हैं सब रास्ते अब बंद ज़िन्दगी मेंरिसते हैं अब तो ज़ख़्म लहू से कभी अश्कों सेअपने भी हुआ करते थे हौसले बुलंद ज़िन्दगी मेंलम्हों को जाने मुझ से ये कैसी दुश्मनी हैमुझ को भी मिलते ख़ुशी के चंद ज़िन्दगी मेंना होता दर्द ना होता रंज मुझ को भी … [Read more…]

बेसबब लिखता हूँ मैं

बेसबब लिखता हूँ मैंज़िन्दगी की चाल कोकौन समझा है यहाँकोई आता हैकोई जाता हैकुछ निशान छोड़ करकोई पहचान छोड़ करएक उजड़ी हुई बस्ती मेंएक टूटा हुआ मकान छोड़ करना आने का कोई सबब तेराना जाने का कोई सबब हैइस लिएबेसबब लिखता हूँ मैंकभी हैं कदम बहुत हलकेकभी बोझ हैं बलाओं सेकभी रात कटती है इक … [Read more…]