प्रकृति में न्याय नहीं होता
बस प्रतीत होता है मानवों को
खुद को छलावा देने के लिए
हम प्रकृति के एक हिस्से को लेते हैं
और समय से सीमित कर देते हैं
और न्याय की परिकल्पना कर लेते हैं
प्रजातियां आती हैं
और प्रजातियां लुप्त हो जाती हैं
और हम को अपने कर्म के फल की
चिंता रहती है
लगता है कि अच्छा करने से अच्छा होगा
और बुरा करने से बुरा
ना कुछ अच्छा है
ना कुछ बुरा है
जो है वो है
अच्छा बुरा सामाजिक परिभाषाएँ हैं
जो समय के साथ
परिवर्तित होती रहती हैं
प्रकृति के नियमों से इनका
कोई सामंजस्य नहीं है
प्रकृति अगर कुछ है तो उदासीन है
एक तरह से हंसती हुई
हमारे छोटे दृष्टिकोण पे
जो सीमित समय और सीमित भूगोल से
अंतहीन प्रकृति को मापता है
प्रकृति के कोलाहल में
कोई काल्पनिक व्यवस्था ढूंढता है
