बुलबुला हूँ कुछ ही क्षण में
क्षत-विक्षत हो जाऊँगा,
पर अपने जीवन की अल्पता से
मैं नहीं घबराऊँगा।
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चाहे सतह पर ही हो मेरे
सात रंगों की चमक,
चाहे अंतर्मन में उपस्थित
हो एकाकी शून्य तक,
एक बच्चे की ख़ुशी बन के मैं
स्वयं ही बिखर जाऊँगा।
अपने जीवन की अल्पता से
मैं नहीं घबराऊँगा।
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किसने समझी है यहाँ पर
नटखट समय की अठखेलियाँ,
एक क्षण में प्राप्त सब है
दूजे में सब खोये यहाँ,
कब तलक इन आँकड़ों में
फँस के मैं रह पाऊँगा।
अपने जीवन की अल्पता से
मैं नहीं घबराऊँगा।
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ना तिमिर का भेदी हूँ मैं
ना कोई घर का दिया,
एक पल में जी लिया
एक पल में मर लिया,
लुप्त होते-होते भी
बस यही दोहराऊँगा।
अपने जीवन की अल्पता से
मैं नहीं घबराऊँगा।
Bahut Khub sir ji!