Poem: तुम आओगे

तुम आओगे
कुछ  है मुझे
विश्वास सा
कुछ है मुझे
आभास सा
क्षितिज पे जब लालिमा
खिल उठेगी झूम के
आग जल के अधरों को
सुस्त होगी चूम के
स्मृति के धूमिल  प्रष्ठों से
एक पुराना अध्याय ले
तुम आओगे

इक ठिठुरती रात को
ओस को ओढ़ कर
विलुप्त होती पग डांडियों पे
अंधकार तोड़ कर
अल्प होते क्षण विक्षण
पूर्णिमा के चाँद से
श्वेत वज्र से बरसते
तुम आओगे

जब श्वास
हो जायेगी मंद
जब भीष्म होगा
अंतर्द्वनध
जब होने लगेगा
मन शिथिल
जब आशा
हो जायेगी विरल
बन पवन में
सुगंध तुम
बन जीने का
प्रबंध तुम
तिमिर को
चीरते हुए
मेरे अस्तित्व
का प्रकाश बन
तुम आओगे

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