टूटे हुए लोगों का
कोई अपना नहीं होता
भींगी हुई आँखों का
कोई सपना नहीं होता
सूखेगे तभी तो
जब हवा सर्द लगेगी
रिसते हुए ज़ख्मों को
ढकना नहीं होता
घुलती हुई जाती हैं
हाथों में लकीरे
ऐसे भी मुक़द्दर को
तकना नहीं होता
बंधते ही चले जाते हैं
कदमों में मेरे पत्थर
पर एक राह पकड़ ली तो
थकना नहीं होता
