अकेलापन कोई मौसम नहीं है
ना ही कोई मौसमी पंछी
जो आएगा और फिर चला जाएगा
ये तो दिल में उतर जाएगा
रात को जब किचन में
जाओगे खाना बनाने के लिए
खाली बर्तन घूरेगे तुम्हें
पूछेंगे कि क्या तुम भी
खाली हो उन की तरह
कभी कभी भर जाते हैं
खाना बनाते वक़्त
पर किस्मत में लिखा है
अधिकतर खाली रहना
मेट्रो में बैठे हुए
जब देखोगे खिड़की के बाहर
स्टेशन आयेंगे और जाएंगे
पर सब धुँधला सा होगा
रफ्तार तो होगी लेकिन
अन्दर में सब ठहरा हुआ
जब रहोगे लोगों के बीच में
सब कुछ सब को सही लगेगा
पर तुम्हारे दिमाग में
कुछ और ही चल रहा होगा
शून्यता का अथाह सागर
मन मष्तिष्क के हर कोने में
अकेलापन कोई मौसम नहीं है
ना ही कोई मौसमी पंछी
जो आएगा और फिर चला जाएगा
ये तो संग ले कर ही तुम्हें जाएगा