अर्थहीन है ये जीवन
और अर्थ की आवश्यकता भी क्या है
मानवीय अहंकार है
स्वयं के अस्तित्व में अर्थ ढूँढना
अपनी प्रजाति को
श्रेयस्कर समझने के लिए
भाषा का अहंकार
धर्म का अहंकार
विज्ञान का अहंकार
कुछ धर्मों के अनुसार
जन्म और पुनर्जन्म
आत्मा और परमात्मा
कुछ और धर्मों के अनुसार
स्वर्ग और नर्क
अप्सराएँ और नदियाँ
या आग और गर्मी
और जीवविज्ञानी के अनुसार
क्रमागत उन्नति का परिणाम
कुछ के अनुसार
अहं ब्रह्मास्मि
कुछ के अनुसार
आदि पाप का जनक
अलग अलग परिभाषा है सब की
और इन परिभाषाओं में भी युद्ध होते हैं
अर्थ है बस अपनी प्रजाति को
महिमामंडित करने का प्रयास
और कई बार
प्रजाति के एक हिस्से को
श्रेष्ट ना हो अगर मानव
इस दर्शन को मान लें
अर्थहीन है ये जीवन
और अर्थ की आवश्यकता भी क्या है