Poetry: जुनून और सुकून

जुनून और सुकून की
ज़ंग बहुत अज़ीम है
कभी चलते रहना भारी लगता है
कभी ठहराव का बोझ बड़ा होता है
चलते रहने में कई सवालात
दिल को घेर लेते हैं
कहाँ जा रहा हूँ
कहाँ तक पहुँचा हूँ
क्या यहीं आने के लिए निकला था
और भी कई सवाल
ना जवाब मिलता है कभी
और कभी जो जवाब मिलता है
वो दिल को मंज़ूर नहीं होता
और एक नया जवाब पाने के लिए
हम सवाल ही बदल देते हैं
और ठहराव का वजन भी
कोई कम तो नहीं है
वही उकताहट
वही रफ़्तार की कमी
सुकून वाले को जुनून चाहिए
और जुनून वेल को सुकून
बस ऐसे ही सुकून और जुनून के
किनारों के बीच
ज़िंदगी का दरिया बहता जाता है
ज़िंदगी का दरिया बहता जाता है

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